लालबहादुर शास्त्री

लालबहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय (उत्तर प्रदेश) में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे अत: सब उन्हें मुंशीजी ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी कर ली थी। लालबहादुर की माँ का नाम रामदुलारी था। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार में नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। जब नन्हें अठारह महीने का हुआ दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया। उसकी माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्ज़ापुर चली गयीं। कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उसने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द  श्रीवास्तव  हमेशा हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लालबहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया।

1928 में उनका विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ। ललिता शास्त्री से उनके छ: सन्तानें हुईं, दो पुत्रियाँ-कुसुम व सुमन और चार पुत्र-हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक। उनके चार पुत्रों में से दो-अनिल शास्त्री और सुनील शास्त्री अभी हैं, शेष दो दिवंगत हो चुके हैं। अनिल शास्त्री कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं जबकि सुनील शास्त्री भारतीय जनता पार्टी में चले गये।

दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी ने आजाद हिन्द फौज को “दिल्ली चलो” का नारा दिया, गान्धी जी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में ही बम्बई से अँग्रेजों को “भारत छोड़ो” व भारतीयों को “करो या मरो” का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा पुणे स्थित आगा खान पैलेसमें चले गये। 9 अगस्त 1942 के दिन शास्त्रीजी ने इलाहाबादपहुँचकर इस आन्दोलन के गान्धीवादी नारे को चतुराई पूर्वक “मरो नहीं, मारो!” में बदल दिया और अप्रत्याशित रूप से क्रान्ति की दावानल को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दे दिया। पूरे ग्यारह दिन तक भूमिगत रहते हुए यह आन्दोलन चलाने के बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्रीजी गिरफ्तार हो गये।

निष्पक्ष रूप से यदि देखा जाये तो शास्त्रीजी का शासन काल बेहद कठिन रहा। पूँजीपति देश पर हावी होना चाहते थे और दुश्मन देश हम पर आक्रमण करने की फिराक में थे। 1965 में अचानक पाकिस्तान ने भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया। परम्परानुसार राष्ट्रपति ने आपात बैठक बुला ली जिसमें तीनों रक्षा अंगों के प्रमुख व मन्त्रिमण्डल के सदस्य शामिल थे। संयोग से प्रधानमन्त्री उस बैठक में कुछ देर से पहुँचे। उनके आते ही विचार-विमर्श प्रारम्भ हुआ। तीनों प्रमुखों ने उनसे सारी वस्तुस्थिति समझाते हुए पूछा: “सर! क्या हुक्म है?” शास्त्रीजी ने एक वाक्य में तत्काल उत्तर दिया: “आप देश की रक्षा कीजिये और मुझे बताइये कि हमें क्या करना है?”

शास्त्रीजी ने इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और जय जवान-जय किसान का नारा दिया। इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सारा देश एकजुट हो गया। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

भारतीय थलसेना ने दूनी शक्ति से प्रत्याक्रमण करके बरकी गाँव के समीप नहर को पार करने मे सफलता अर्जित की। इससे भारतीय सेना लाहौर के हवाई अड्डे पर हमला करने की सीमा के भीतर पहुँच गयी। इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबराकर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील की।

आखिरकार रूस और अमरिका की मिलीभगत से शास्त्रीजी पर जोर डाला गया। उन्हें एक सोची समझी साजिश के तहत रूस बुलवाया गया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। हमेशा उनके साथ जाने वाली उनकी पत्नी ललिता शास्त्री को बहला फुसलाकर इस बात के लिये मनाया गया कि वे शास्त्रीजी के साथ रूस की राजधानी ताशकन्द न जायें और वे भी मान गयीं। अपनी इस भूल का श्रीमती ललिता शास्त्री को मृत्युपर्यन्त पछतावा रहा। जब समझौता वार्ता चली तो शास्त्रीजी की एक ही जिद थी कि उन्हें बाकी सब शर्तें मंजूर हैं परन्तु जीती हुई जमीन पाकिस्तान को लौटाना हरगिज़ मंजूर नहीं। काफी जद्दोजहेद के बाद शास्त्रीजी पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर ताशकन्द समझौते के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा लिये गये। उन्होंने यह कहते हुए हस्ताक्षर किये थे कि वे हस्ताक्षर जरूर कर रहे हैं पर यह जमीन कोई दूसरा प्रधान मन्त्री ही लौटायेगा, वे नहीं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्धविराम के समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ घण्टे बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही उनकी मृत्यु हो गयी। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि क्या वाकई शास्त्रीजी की मौत हृदयाघात के कारण हुई थी? कई लोग उनकी मौत की वजह जहर को ही मानते हैं।

शास्त्रीजी की अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ शान्तिवन (नेहरू जी की समाधि) के आगे यमुना किनारे की गयी और उस स्थल को विजय घाट नाम दिया गया। जब तक कांग्रेस संसदीय दल ने इन्दिरा गान्धी को शास्त्री का विधिवत उत्तराधिकारी नहीं चुन लिया, गुलजारी लाल नन्दाकार्यवाहक प्रधानमन्त्री रहे।


शास्त्री जी के जीवन की कुछ प्रेरणादायी घटनाये ~

***1***

एक बार पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री कपड़े की एक दुकान में साडि़यां खरीदने गए। दुकान का मालिक शास्त्री जी को देख बेहद प्रसन्न हुआ। उसने उनके आने को अपना सौभाग्य माना और उनका स्वागत-सत्कार किया।

शास्त्री जी ने उससे कहा कि वे जल्दी में हैं और उन्हें चार-पांच साडि़यां चाहिए।

दुकान का मैनेजर शास्त्री जी को एक से बढ़ कर एक साडि़यां दिखाने लगा। सभी साडि़यां काफी कीमती थीं। शास्त्री जी बोले- भाई, मुझे इतनी महंगी साडि़यां नहीं चाहिए। कम कीमत वाली दिखाओ।

इस पर मैनेजर ने कहा- सर… आप इन्हें अपना ही समझिए, दाम की तो कोई बात ही नहीं है। यह तो हम सबका सौभाग्य है कि आप पधारे।

शास्त्री जी उसका आशय समझ गए। उन्होंने कहा- मैं तो दाम देकर ही लूंगा। मैं जो तुम से कह रहा हूं उस पर ध्यान दो और मुझे कम कीमत की साडि़यां ही दिखाओ और उनकी कीमत बताते जाओ।

तब मैनेजर ने शास्त्री जी को थोड़ी सस्ती साडि़यां दिखानी शुरू कीं। शास्त्री जी ने कहा- ये भी मेरे लिए महंगी ही हैं। और कम कीमत की दिखाओ।

मैनेजर को एकदम सस्ती साड़ी दिखाने में संकोच हो रहा था। शास्त्री जी इसे भांप गए। उन्होंने कहा- दुकान में जो सबसे सस्ती साडि़यां हों, वो दिखाओ। मुझे वही चाहिए।

आखिरकार मैनेजर ने उनके मनमुताबिक साडि़यां निकालीं। शास्त्री जी ने उनमें से कुछ चुन लीं और उनकी कीमत अदा कर चले गए। उनके जाने के बाद बड़ी देर तक दुकान के कर्मचारी और वहां मौजूद कुछ ग्राहक शास्त्री जी की सादगी की चर्चा करते रहे।

***2***

शास्त्री जी जब 1964 में प्रधानमंत्री बने, तब उन्हें सरकारी आवास के साथ ही इंपाला शेवरले कार मिली, जिसका उपयोग वह न के बराबर ही किया करते थे। वह गाड़ी किसी राजकीय अतिथि के आने पर ही निकाली जाती थी।

एक बार उनके पुत्र सुनील शास्त्री किसी निजी काम के लिए इंपाला कार ले गए और वापस लाकर चुपचाप खड़ी कर दी। शास्त्रीजी को जब पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा कि- कल कितने किलोमीटर गाड़ी चलाई गई ?

और जब ड्राइवर ने बताया कि चौदह किलोमीटर, तो उन्होंने निर्देश दिया- लिख दो, चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज।

शास्त्रीजी यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने अपनी पत्नी को बुलाकर निर्देश दिया कि उनके निजी सचिव से कह कर वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा करवा दें।

***3***

शास्त्री जी को खुद कष्ट उठाकर दूसरों को सुखी देखने में जो आनंद मिलता था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

एक बार जब शास्त्रीजी रेल मंत्री थे और बम्‍बई जा रहे थे। उनके लिए प्रथम श्रेणी का डिब्बा लगा था। गाड़ी चलने पर शास्त्रीजी बोले- डिब्बे में काफ़ी ठंडक है, वैसे बाहर गर्मी है।

उनके पी.ए. कैलाश बाबू ने कहा- जी, इसमें कूलर लग गया है।

शास्त्रीजी ने पैनी निगाह से उन्हें देखा और आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा-

कूलर लग गया है?… बिना मुझे बताए? आप लोग कोई काम करने से पहले मुझसे पूछते क्यों नहीं? क्या और सारे लोग जो गाड़ी में चल रहे हैं, उन्हें गरमी नहीं लगती होगी?

शास्त्रीजी ने कहा- कायदा तो यह है कि मुझे भी थर्ड क्लास में चलना चाहिए, लेकिन उतना तो नहीं हो सकता, पर जितना हो सकता है उतना तो करना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा- बड़ा गलत काम हुआ है। आगे गाड़ी जहाँ भी रुके, पहले कूलर निकलवाइए।

मथुरा स्टेशन पर गाड़ी रुकी और कूलर निकलवाने के बाद ही गाड़ी आगे बढ़ी। आज भी फर्स्ट क्लास के उस डिब्बे में जहाँ कूलर लगा था, लकड़ी जड़ी है।

***4***

भारत के सब प्रधानमंत्रियों में शास्‍त्री जी बिल्‍कुल अलग ही थे। उनका जीने का तरीका आम आदमी जैसा ही था। वो मंत्री बने तो सरकारी वाहन तो मिला, लेकिन अपने निजी काम के लिए उन्‍होंने कभी भी उस वाहन का उपयोग नही किया जिससे सम्‍बंधित एक और प्रेरक घटना अग्रानुसार है।

एक दिन शास्‍त्री जी अपने किसी निजी काम से घोडागाडी में बैठ कर कहीं जा रहे थे। जब वो नीचे उतरे तो घोडागाडी वाले ने उनसे दो रुपया मांगा। शास्त्री को मालुम था कि किराया केवल डेढ रुपया ही होता है, तो मात्र आठ आने के लिए वे उस घोडागाडी वाले से उलझ पडे। दोनों के बीच चलती बहस को देख कर कुछ लोग इकठ्ठे हो गये। लोगों ने पहचान लिया, कोइ बोला- ये तो लाल बहादूर शास्त्री हैं…

ये बात सुनते ही घोडागाडी वाला शरमा गया, शास्त्री के पैर पड गया और पैसे लेने से इन्कार करने लगा। लेकिन शास्त्री जी ने उसे डेढ रूपया दिया जो कि उसका वाजिब किराया होता था और चले गये।

***5***

एक बार शास्त्रीजी की अलमारी साफ़ की गई और उसमें से अनेक फटे पुराने कुर्ते निकाल दिये गए। लेकिन शास्त्रीजी ने वे कुर्ते वापस मांगे और कहा- अब नवम्बर आयेगा, जाड़े के दिन होंगे, तब ये सब काम आयेंगे। ऊपर से कोट पहन लूँगा न।

शास्त्रीजी का खादी के प्रति अनुराग ही था कि उन्होंने फटे पुराने समझ हटा दिये गए कुर्तों को सहेजते हुए कहा- ये सब खादी के कपड़े हैं। बड़ी मेहनत से बनाए हैं बीनने वालों ने। इसका एक-एक सूत काम आना चाहिए।

***6***
एक बार शास्‍त्री जी अपने कुछ मित्रों के साथ गंगा नदी के पार मेला देखने गए। शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो शास्‍त्री जी ने नाव के किराये के लिए जब अपनी जेब में हाथ डाला तो उनकी जेब में एक पाई भी नहीं थी, लेकिन शास्‍त्री जी ने ये बात अपने मित्रों से नहीं कही बल्कि वे उनसे बोले कि वे थोडी देर और मेला देखेंगे और बाद में आऐंगे। चूंकि शाम हो चुकी थी, इसलिए उनके सभी मित्र उन्‍हें वहीं छोडकर चले गए।

जब उनके मित्रों की नाव उनकी आँखों से ओझल हो गई तब उन्‍होंने अपने कपड़े उतारकर अपने सिर पर लपेट लिया और नदी में उतर गए। उस समय नदी उफान पर थी। बड़े-से-बड़ा तैराक भी आधे मील चौड़े पाट को पार करने की हिम्मत नहीं कर रहा था। पास खड़े मल्लाहों ने भी उन्‍हें रोकने की कोशिश की, लेकिन दृढ निश्‍चयी शास्‍त्री जी ने किसी की न सुनी और किसी भी खतरे की परवाह किए बिना वे नदी में तैरने लगे।

पानी का बहाव तेज़ था और नदी भी काफी गहरी थी। रास्ते में एक नाव वाले ने उसे अपनी नाव में सवार होने के लिए कहा लेकिन शास्‍त्री जी ने उसकी बात भी नहीं सुनीं, वे नहीं रूके बल्कि तेज बहाव में भी तैरते रहे और थोडी देर बाद वे सकुशल दूसरी ओर पहुँच गए।

शास्‍त्रीजी चाहते तो नदी पार करने के लिए अपने दोस्‍तों से किराया उधार ले सकते थे, अथवा नदी में तैरते समय जो नाव नदी में थी, उसमें चढने के लिए स्‍वयं नाव वाले ने कहा, लेकिन उनका स्वाभिमान न तो उन्‍हें अपने मित्रों से उधार लेने की की अनुमति नहीं दे रहा था न ही बिना पैसा दिए नाम में चढने की।

***7***
जब शास्‍त्री जी अपने दोस्तों के साथ एक बगीचे में फूल तोड़ने के लिए घुस गए। उनके दोस्तों ने बहुत सारे फूल तोड़कर अपनी झोलियाँ भर लीं, लेकिन शास्‍त्री जी उन सभी में सबसे छोटे और कमज़ोर थे, इसलिए वे एक भी फूल न तोड सके।

घटना भी ऐसी हुई कि जैसे ही उन्‍होंने उस बगीचे से पहला फूल तोड़ा, बगीचे का माली आ पहुँचा। दूसरे लड़के तो भागने में सफल हो गए लेकिन शास्‍त्री जी सबसे छोटे व कमजोर होने की वजह से माली के हत्थे चढ़ गया। बहुत सारे फूलों के टूट जाने और दूसरे लड़कों के भाग जाने के कारण माली बहुत गुस्से में था। उसने अपना सारा क्रोध उस छोटे से छः साल के शास्‍त्री जी पर निकाला और उसे पीट दिया। मासूम से शास्‍त्री जी ने माली से कहा–आप मुझे इसलिए पीट रहे हैं क्योकि मेरे पिता नहीं हैं!

यह सुनकर माली का क्रोध जाता रहा। वह बोला– बेटे, पिता के न होने पर तो तुम्हारी जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है।

माली की मार खाने पर तो बालक शास्‍त्री जी ने एक आंसू भी नहीं बहाया था लेकिन यह माली की ये बात सुनकर वे बिलखकर रो पड़े। यह बात उसके दिल में घर कर गई और उसने इसे जीवन भर नहीं भुलाया। उसी दिन से बालक शास्‍त्री जी ने अपने ह्रदय में यह निश्चय कर लिया कि वे कभी भी ऐसा कोई काम नहीं करेंगे, जिससे किसी का कोई नुकसान हो।

***8***

लाल बहादुर शास्‍त्री देश के प्रधानमंत्री बनने वाले ऐसे सरल और साधारण व्यक्ति थे जिनके जीवन का आदर्श प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वही रहा। भारत में बहुत कम लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने समाज के बेहद साधारण वर्ग से अपना जीवन शुरू कर देश के सबसे पड़े पद को प्राप्त किया। शास्‍त्री जी को अपने देशवासियों से बहुत प्रेम था और उनके इसी देशप्रेम से सम्‍बंधित उनके जीवन से जुडी हुई एक और प्रेरक घटना है।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाला लाजपतराय ने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को आर्थिक सहायता प्रदान करवाना था।

आर्थिक सहायता पाने वालों में लाल बहादुर शास्त्री भी थे। उनको घर का खर्चा चलाने के लिए सोसाइटी की तरफ से 50 रुपए प्रति माह दिए जाते थे। एक बार उन्होंने जेल से अपनी पत्नी ललिता को पत्र लिखकर पूछा कि- क्या उन्हें ये 50 रुपए समय से मिल रहे हैं और क्या ये घर का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त हैं ?

ललिता शास्त्री ने तुरंत जवाब दिया कि- ये राशि उनके लिए काफी है। वो तो सिर्फ 40 रुपये ख़र्च कर रही हैं और हर महीने 10 रुपये बचा रही हैं।

लाल बहादुर शास्त्री ने तुरंत सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी को पत्र लिखकर कहा कि- उनके परिवार का गुज़ारा 40 रुपये में हो जा रहा है, इसलिए उनकी आर्थिक सहायता घटाकर 40 रुपए कर दी जाए और बाकी के 10 रुपए किसी और जरूरतमंद को दे दिए जाएं।

***9***

शास्‍त्री जी के जीवन में कभी भी किसी बात का कोई अहंकार नहीं रहा और इस बात को शास्त्री जी के बेटे अनिल शास्त्री निम्‍न वृतांत द्वारा साबित करते हैं जिन्‍हें उन्‍होंने अपनी पुस्‍तक में वर्णित किया है-

एक बार रात के भोजन के बाद उनके पिता ने उन्हें बुलाकर कहा कि- मैं देख रहा हूँ कि आप अपने से बड़ों के पैर ढंग से नहीं छू रहे हैं। आप के हाथ उनके घुटनों तक जाते हैं और पैरों को नहीं छूते।

अनिल ने अपनी ग़लती नहीं मानी और कहा कि- आपने शायद मेरे भाइयों को ऐसा करते हुए देखा होगा।

इस पर शास्त्री जी झुके और अपने 13 साल के बेटे के पैर छूकर बोले कि- इस तरह से बड़ों के पैर छुए जाते हैं।

उनका ये करना था कि अनिल रोने लगे। वो कहते हैं कि- तब का दिन है और आज का दिन, मैं अपने बड़ों के पैर उसी तरह से छूता हूँ जैसे उन्होंने सिखाया था।

एक बच्‍चे के पैर छू लेने में भी जिस व्‍यक्ति को कोई हीनता महसूस न होती हो, वही व्‍यक्ति अहंकार रहित माना जा सकता है और ये घटना साबित करती है कि शास्‍त्री जी केवल बडे पदों पर ही नहीं पहुंचे थे, बल्कि वो वास्‍तव में हृदय से भी काफी बडे थे, जिनके लिए पद व उम्र में छोटे व बडे दोनों एक समान थे।

***10***

उस समय लालबहादुर शास्त्री भारत के गृह मंत्री थे और जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैयर उनके प्रेस सचिव थे। कुलदीप नैयर याद करते हुए बताते हैं कि एक बार वो और शास्त्री जी महरोली से एक कार्यक्रम में भाग लेकर लौट रहे थे। एम्स के पास उन दिनों एक रेलवे क्रॉसिंग हुआ करती थी जो किसी ट्रेन के आने का समय होने की वजह से उस समय बंद थी।

शास्त्री जी ने देखा कि बगल में गन्ने का रस निकाला जा रहा है। उन्होंने कहा कि- जब तक फाटक खुलता है, क्यों न गन्ने का रस पिया जाए।

और इससे पहले कि कुलदीप नैयर कुछ कहते, वो खुद दुकान पर गए और अपने साथ-साथ कुलदीप, सुरक्षाकर्मी और ड्राइवर के लिए भी गन्ने के रस का ऑर्डर किया।

दिलचस्प बात ये है कि किसी ने उन्हें पहचाना नहीं, यहां तक कि गन्ने का रस बेचनेवाले ने भी नहीं।

इस घटना से हम समझ सकते हैं कि वे कितने सादगी भरा जीवन जीते थे। इतना ही नहीं, उनमें अपने प्रधानमंत्री होने का भी कोई अहंकार नहीं था, इसीलिए तो वे स्‍वयं ही न केवल अपने लिए बल्कि अपने सुरक्षाकर्मी के लिए भी गन्‍ने के रस का ऑडर दे आए।

***11***

शास्‍त्री जी के सादे और ईमानदारी भरे जीवन से सम्‍बंधित एक और घटना का जिक्र मिलता है कि शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने तक उनका अपना घर तो क्या एक कार तक नहीं थी। एक बार उनके बच्चों ने उन्‍हें उलाहना दिया कि- अब आप भारत के प्रधानमंत्री हैं। कम से कम अब आपके पास अपनी एक कार तो होनी ही चाहिए।

उस ज़माने में एक फ़िएट कार 12,000 रुपए में आती थी। उन्होंने अपने एक सचिव से कहा कि- जरा देखें मेरे बैंक खाते में कितने रुपए हैं?

सचिव ने बताया कि उनका बैंक बैलेंस मात्र 7,000 रुपए था। जब शास्‍त्री जी के बच्चों को पता चला कि शास्त्री जी के पास कार खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं तो उन्होंने कहा कि- कार मत खरीदिए।

लेकिन शास्त्री जी ने कहा कि- बाकी के पैसे बैंक से लोन लेकर जुटा लेंगे।

और उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से कार खरीदने के लिए 5,000 रुपए का लोन लिया। हालांकि एक साल बाद लोन चुकाने से पहले ही उनका निधन हो गया जिसे बाद में उनकी पत्नी ने चार साल बाद तक अपनी पेंशन से चुकाया। शास्‍त्री जी की ये कार आज भी दिल्ली के लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल में रखी हुई है और दूर- दूर से लोग इसे देखने आते हैं।

***12***

शास्‍त्री जी प्रधानमंत्री बनने से पहले जैसे थे, प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनके स्‍वभाव या विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया था और इसका उल्‍लेख स्‍वयं शास्‍त्री जी ने एक घटना के दौरान किया था।

बात साल 1964 की है, जब शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने तो उनके बेटे अनिल शास्त्री दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में पढ़ रहे थे। उस जमाने में आज की तरह पैरेंट्स-टीचर मीटिंग नहीं हुआ करती थी, लेकिन अभिभावकों को छात्र का रिपोर्ट कार्ड लेने के लिए जरूर बुलाया जाता था।

शास्त्री ने भी तय किया कि एक अभिभावक की तरह वो भी अपने बेटे का रिपोर्ट कार्ड लेने स्‍वयं उनके स्कूल जाएंगे। स्कूल पहुंचने पर वो स्कूल के गेट पर ही उतर गए। हालांकि सिक्योरिटी गार्ड ने कहा कि वो कार को स्कूल के परिसर में ले आएं, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।

शास्‍त्री जी के बेटे की कक्षा कक्षा 11 बी पहले माले पर थी। शास्‍त्री जी खुद चलकर उनकी कक्षा में गए, जहां क्लास टीचर रेवेरेंड टाइनन उन्हें वहां देखकर हतप्रभ रह गए और बोले- सर… आपको रिपोर्ट कार्ड लेने यहां आने की जरूरत नहीं थी। आप किसी को भी भेज देते।

शास्त्री का जवाब था- मैं वही कर रहा हूं जो मैं पिछले कई सालों से करता आया हूं और आगे भी करता रहूंगा।

रेवेनेंड टाइनन ने कहा- लेकिन अब आप भारत के प्रधानमंत्री हैं।

शास्त्री जी मुस्कराए और बोले- ब्रदर टाइनन… मैं प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नहीं बदला, लेकिन लगता है आप बदल गए हैं।

ये घटना स्‍वयं बताती है कि शास्‍त्रीजी प्रधानमंत्री बनने के बावजूद अपने घरेलू कर्तव्‍यों को स्‍वयं ही निभाया करते थे। यानी प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे वैसे ही थे, जैसे प्रधानमंत्री बनने से पहले थे।

***शास्‍त्री जी ***

लाल बहादुर शास्त्री को बचपन में एक विशेष प्रकार की बीमारी हो गई थी, जिसे सूखे की बीमारी कहा जाता है और इस बीमारी की वजह से ही उनका शारीरिक विकास ठीक से नहीं हो पाया था। जानकर हैरानी होती है कि उनका लंबाई मात्र 5 फीट व वजन कुल 39 किलोग्राम था, लेकिन अपने छोटे कद व कम वजन के बावजूद वे बहुत बडे-बडे काम कर गए, और उनके जीवन से आज भी प्रेरणा ली जाती है।